गंधर्व राज क्रोंच भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है..
भगवान गणेश जी का वाहन मूषक चूहा पूर्व में राजा इंद्र की सभा में रहने वाला एक क्रोंच नामक का गंधर्व था,,
जो सभी गंधर्व में प्रमुख था, एक बार इंद्र अपने राज सिंहासन पर विराजमान थे ,उस समय गंधर्व राज क्रोंच को किसी कार्य वर्ष कहीं जाना था,
अतः उसने उठकर देवराज इंद्र से आज्ञा ली और शीघ्रता में वहां से जाने लगा,
देवराज की सभा में महान तपस्वी महर्षि बामदेव जी विराजमान थे ,क्रोंच गंधर्व शीघ्रता में तेजी से चलने लगा उस समय वहां बैठे हुए महर्षि बामदेव को भूल से उसका पांव छू ,गया महर्षि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो गए..
उन्होंने तुरंत ही क्रौंच गंधर्व को शाप दे दिया और कहा _ अरे गंधर्व तू ऐसा मदमस्त हो रहा है कि ,बैठे हुए मुझ शांत मुनि को लात मार रहा है, तू मूषक बनेगा, मूषक का शरीर हो जाएगा तेरा,
गंधर्व यह सुनकर बहुत दुःखी हो गया,,
उसने महर्षि बामदेव से क्षमा याचना की ,और बहुत रोया ,गिडगिडाया अपना श्राप वापस लेने के लिए प्रार्थना की ,
तब महर्षि ने प्रसन्न होकर कहा कि, तू मूषक तो अवश्य ही बनेगा परंतु भगवान श्री गणेश जी का वाहन बन जाने से तू प्रख्यात हो जाएगा…
और अत्यंत सुख प्राप्त करेगा, भगवान गणेश जी के साथ साथ तेरा भी नाम लिया जाएगा ,,
मस्तक सिंदूर सोहे मूष की सवारी ..
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा..
इस प्रकार गणेश जी की कृपा से तेरा सब दुख दूर हो जाएगा ,
तब गंधर्व राज क्रौंच शीघ्र ही मूषक बनकर महर्षि पाराशर के आश्रम में जाकर गिरा ,वह मूषक भी बहुत अलौकिक था पर्वत के समान विशालकाय और भयंकर था..
उसके रोम एवं नख पर्वत के शिखर के समान लग रहे थे ,
मूषक के दांत बहुत तीक्ष्ण थे,
मूषक का स्वर अत्यंत कर्कश था,
महर्षि पाराशर जी के आश्रम में उस मूषक ने उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया ,पात्रों को तोड़-फोड़ कर समस्त अन्न खा गया,,
बड़े बड़े ग्रंथो को कुतर कुतर कर नष्ट कर डाले,
आश्रम की वाटिका के समस्त वृक्षों को कुतर दिया, इस प्रकार फल पुष्पो एवम् पोधो को नष्ट कर दिया,
तब महर्षि पाराशर जी बहुत दुखी हो गए, तब भगवान से प्रार्थना करने लगे ,,
महर्षि की प्रार्थना सुनकर भगवान गणेश जी ने उन्हें आश्वासन दिया ,
पूज्य महर्षि आप मेरे पालक पिता है, मेरे रहते आप पर कोई विपत्ति आए यह में सहन नहीं कर सकता ,,
आपका प्रिय कार्य करना मेरा परम कर्तव्य है ,,
भगवान गणेश जी उस समय पाराशर जी के यहां पुत्र रूप से ही रहते थे,
क्योंकि पार्वती जी के उदर से जन्म लेने के बाद नंदी गण द्वारा ,उनके राजा वरेण्य के यहां प्रसूति गृह में रखवा दिया था,
क्योंकि वरेण्य राजा की पत्नी को जो संतान हुई थी उसे एक राक्षस चुरा कर ले गया था,
परंतु भगवान गणेश का मुंह हाथी के समान चतुर्भुज रूप एवं अरुण वर्ण देखकर,
अशुभ की कल्पना से राजा ने भगवान गणेश की महिमा को न जानकर अशुभ बालक समझकर जंगल में छोड़ दिया था,,
उस समय महर्षि पराशर जी समस्त वेदों के ज्ञाता और महान तपस्वी थे ,
उन्होंने गणेश जी की महिमा और भगवान की अपने ऊपर कृपा समझ कर उनको अपने आश्रम में लाकर अपना पुत्र वध पालन कर रहे थे,,
गणेश जी ने पाराशर जी का कष्ट दूर करने के लिए मूषक की और अपना पाश शस्त्र फेंका,
वह पाश मूषक का कंठ जकड़ कर उसे जमीन के बाहर खींच लाया,,
पाश की जकड़ से मूषक को मूर्छित कर दिया ,
चेतना आने पर मूषक ने भगवान गणेश जी की शरण में जाकर उनकी स्तुति की,
तब भगवान गणेश जी ने उस गंधर्व राज क्रोंच को, जो मूषक बन गया था ,
उस मूषक को अपना वाहन बना लिया और गणेश जी मूषक की पीठ पर आरूढ़ हो गए ,,
तब से मूषक भगवान गणेश जी का प्रिय वाहन बन गया..
ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेश चन्द्र
कैलाशपुरी रुद्रेश्वर मंदिर इंदौर
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