भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को क्यों मनाई जाती है राधाष्टमी? जानें भगवान श्री कृष्ण की पराशक्ति श्री राधा जी के जन्म की पौराणिक कथा, सुदाम के श्राप और उनके पृथ्वी पर आगमन का रहस्य।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी वह दिव्य तिथि है जब स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आराध्य, उनकी तजोमयी पराशक्ति श्री राधा जी पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं। यह पर्व हमें राधा-कृष्ण के प्रेम, उनके दिव्य स्वरूप और उनके अनमोल संबंधों की याद दिलाता है।

श्री राधा जी का गोलोक से पृथ्वी पर आगमन

पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री राधा जी और श्री कृष्ण एक ही हैं, अलग नहीं। वे गोलोक में श्री कृष्ण के वाम भाग (बाएं अंग) से प्रकट हुई थीं। जहाँ राधा जी के रोम-कूपों से उनकी सहस्रों गोप-सखियाँ उत्पन्न हुईं, वहीं कृष्ण के रोम-कूपों से गोप सखाओं की उत्पत्ति हुई। यह सभी श्री राधा-कृष्ण के साथ गोलोक में निवास करते थे।

यह जानकर आश्चर्य होता है कि स्वयं भगवान की पराशक्ति को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है।

सुदाम का श्राप और राधा जी का पृथ्वी पर जन्म

एक बार सखी बिरजा के भवन में श्री कृष्ण से मिलने के लिए जब राधा जी जा रही थीं, तो द्वार पर सुदाम नामक गोप ने उन्हें रोक दिया था। इस बात पर क्रोधित होकर राधा जी ने सुदाम को जालंधर नामक राक्षस होने का श्राप दे दिया। प्रत्युत्तर में, सुदाम ने श्री राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने और वहाँ सौ वर्षों तक श्री कृष्ण से अलग रहने का श्राप दे दिया था।

इसी श्राप के कारण राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। उन्होंने वृषभान राजा की पत्नी कीर्ति देवी के गर्भ में प्रवेश किया और भाद्रपद शुक्ल अष्टमी सोमवार को अनुराधा नक्षत्र में दिन के 12:00 बजे अभिजीत मुहूर्त में प्रकट हुईं। इसी कारण इस तिथि को श्री राधा जन्माष्टमी कहा जाता है।

वृषभान और कीर्ति देवी: एक वरदान की कथा

वृषभान पूर्व जन्म में राजा सुचंद्र नामक एक चक्रवर्ती सम्राट थे, जिन्हें साक्षात भगवान का अंश माना जाता था। उनकी पत्नी कलावती थीं, जो आर्यमा नामक पितरों की तीन मानसी कन्याओं में से एक थीं।

  • एक कन्या, मेनका, राजा हिमाचल की पत्नी थीं और उनसे ही माता पार्वती का जन्म हुआ था।
  • दूसरी कन्या, रत्नमाला, राजा जनक की पत्नी थीं और उनके यहाँ से माता सीता पृथ्वी से उत्पन्न हुई थीं।

राजा सुचंद्र और उनकी पत्नी कलावती ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे वरदान प्राप्त किया था। इसी वरदान के फलस्वरूप, अगले जन्म में वे वृषभान राजा और उनकी पत्नी कीर्ति देवी के रूप में प्रकट हुए, और उनके यहाँ गोलोक से स्वयं श्री राधा जी का जन्म हुआ।

राधाष्टमी का महत्व

श्री राधा जी के प्रकट होने पर, आकाश में बादल छाए हुए थे, देवतागण नंदनवन के दिव्य पुष्पों की वर्षा कर रहे थे, नदियों का जल स्वच्छ हो गया था और सभी दिशाएं आनंद से भर उठी थीं। सैकड़ों जन्मों तक तप करने के बाद भी जिन्हें दर्शन नहीं मिलते, उन श्री राधा जी ने आज वृषभान के यहाँ सगुण साकार रूप में जन्म लिया था।

इस वर्ष, अष्टमी तिथि और अभिजीत काल में अनुराधा नक्षत्र का योग होने से श्री राधाष्टमी का महत्व और भी अधिक हो गया है। यह दिन हमें राधा-कृष्ण के निस्वार्थ प्रेम, भक्ति और उनके दिव्य स्वरूप की याद दिलाता है।

जय श्री राधे!

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