“सीता जी ने टुटे हुये तुलसी पत्र को वापस तुलसी से जोड दिया 

एक बार सीता जी ने एकादशी का व्रत रखा ओर अगले दिन अर्थात द्वादशी के दिन सीता जी तुलसी वाटीका मे गयी,  वहा उन्होने तुलसी की पुजा की तथा परीक्रमा लगाइ,  
तब सीता जी के वस्त्रों के लगने से तुलसी का एक पत्ता टुट कर जमीन पर गिर गया , द्वादशी का दिन था ओर द्वादशी के दिन कभी भी तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए,, 
 यह नियम है अगर उस दिन तुलसी का पत्ता तोड़ते है तो पाप लगता है,, 

अतः यह जान कर सीता जी घबरा गयी यह मुझसे तो बहुत बडा अपराध हो गया,  
शिघ्र हि सीता जी ने उसे उठा कर बार बार प्रणाम किया अपराध के लिये क्षमा मान्गते हुये उसे वाटीका मे वही रख दिया ओर पुनः परिक्रमा सावधानी पुर्वक करके अपने राज महल मे चली गयी, 

परन्तु यह बात किसी को नहीं बताइ कुछ देर बाद नारद जी वहा श्री राम जी से मिलने आये भगवान ने नारद जी को भोजन के लिये आग्रह किया ,


तब भगवान ने सीता जी से कहा कि शिघ्र हि नारद जी को भोजन कराओ जब सीता माता भोजन के लिये अंदर तो नारद जी ने कहा प्रभु मे सीता जी के हाथ का भोजन स्वीकार नही करूंगा,,


 तब सीता जी चकित हो गयी, भगवन राम जी ने नारद जी से पूछा कि एसा क्यु,  स्पष्ट बताये, तब नारद जी ने कहा आज द्वादशी है ओर आज सीता जी ने तुलसी पत्र को तोडा है,
 सीता जी को पाप लगा है, क्युकि शास्त्रो मे वर्णन आता है कि द्वादशी, सक्रांति, चतुर्दशी, चवदश, प्रातः काल, सायम काल, सन्ध्या के समय,  रात्री मे, सुर्य ग्रहण के समय,  घर परिवार मे किसी के जन्म लेने पर या किसी की मृत्यु होने पर 12 दिन तक तुलसी पत्र को नही तोड़ना चाहिये,  
यदि भुल से भी उपरोक्त किसी दिन कोइ तुलसी तोड्ता है तो उसे भगवान के सिर को काटने जितना पाप लगता है,  इसी प्रकार द्वादशी को तुलसी पत्र ओर कार्तिक मास मे आँवले की पत्तियाँ जो तोड्ता है वह नरक को जाता है,


 नारद जी ने कहा कि अन्य सभी पापो का प्रायश्चित भी हो जाता है पर द्वादशी को तुलसी तोड़ने का कोइ प्रायश्चित भी नही है, 

अतः सीता जी यदि अपने सतित्व पतिव्र्त धर्म की शक्ति से इस टुटे हुये तुलसी पत्र को वापस लगा दे तो इस्के पाप से बच सकती है,  तब सीता जी सबके साथ उस वाटीका मे गयी ओर सबके सामने तुलसी जी से कहा कि है तुलसी माँ यदि मे सच्ची परिवृता हु श्री राम जी की श्री राम मे ही मेरी एक निश्ठ भक्ति हो तो ये तुलसी पत्र वापस लग जा, 


ओर यह कहते ही तुलसी पत्र वापस लग गया.. इस प्रकार सीता जी ने टुटा जुआ तुलसी पत्र वापस लगा दिया था,,…

जय सीता माँ

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