ग्रह वास्तु सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी “

वास्तु शास्त्र का मुल आधार वेद है, तथा वेदो से ही पुराणो मे इनका वर्णन विस्तार से आया है,, 


मतस्य पुराण मे अधिक विस्तार से वर्णन मिलता है, आगे चल कर विश्वकर्मा प्रकाश, विश्वकर्मा पुराण आदि मे ओर अधिक विस्तार से वर्णन मिलता है, 
एक बार अन्धकासुर दैत्य के साथ भगवान शन्कर का घमासान युद्ध हुआ,

उससे दोनो को पसीना आया ओर दोनो के पसीने की बुन्दे एक हि स्थान पर गिरी, जिससे एक अद्भुत प्राणी का जन्म हुआ, इसी का नाम वास्तु देव , वास्तु पुरुष रखा गया, यह हमेशा शयन करता रहता है, 


इसका सिर ,मुख – इशान कोण (उत्तर ओर पुर्व दिशा का कोण)  ओर पैर नैऋत्य कोण ( दक्षिण ओर पश्चिम के कोण) मे रहते है,, वास्तु देवता का मुख इशान कोण मे रहने से मकान, शुभ माना जाता है, मकान , कालोनी,  नगर, उप नगर, ओर ग्रामो, मे हमेशा इशान कोण मे पुजा घर, देवालय, मन्दिर,  शिवालय, होना शुभ रहता है, 


मुहुर्त चिन्ता मणी ग्रन्थ के अनुसार – घर मे पुर्व स्नानागार (बाथ रूम),  

अग्नि कोण मे किचन,

 दक्षिण मे शयन कझ पश्चिम मे भोजन कक्ष 

वायण्य  कोण यानि ( पश्चिम उत्तर का कोण ) मे अन्न संग्रह गेहूँ आदि का भण्डारण, 

उत्तर मे धनागार रुपये पैसे पास बूक, चेक बूक ,तिजोरी आदि रखी जाना चाहिए, 

इशान कोण उतर पुर्व कोण मे पुजा घर होना चाहिए, 

इसी प्रकार दक्षिण दिशा मे नैऋत्य कोण के पहले शौचालय का निर्माण कराना चाहिए,

 तथा पश्चिम दिशा मे नैऋत्य कोण से आगे अध्ययन कक्ष होना चाहिए, 

अविवाहित सन्तानो का विवाह शिघ्र हो जाये इस हेतु इनका कक्ष उत्तर पश्चिम का कोण वायण्य कोण मे सोने से शिघ्र विवाह हो जाता है,, 

छत पर पानी की टन्की वायण्य कोण या उत्तर दिशा मे रखना चाहिए, 

वायण्य ओर पश्चिम की ओर टन्की भी रख सकते हैं, 

भुमीगत पानी की टन्की नल कनेक्शन पानी का टेन्क, होल, ट्युबवेल, आदि का स्थान इशान कोण, उत्तर पुर्व का कोण हि सर्वोत्तम माना गया है,

 साथ हि अग्नि कोण ओर नैऋत्य कोण मे कभी भी भुमीगत जल का भण्डारण नही करना चाहिए, अन्यथा ये बहुत हानिकारक हो जाता है, 

मकान के पुर्व दिशा मे पानी का निकाश बहुत हि शुभ वृद्धिकारक माना गया है,

 उत्तर दिशा की ओर पानी का निकाश अर्थ धन का लाभ कराता है, 

दक्षिण की ओर होने से रोग ओर पिडा कारक होता है, 

पश्चिम दिशा मे पानी का निकाश धन हानि करता है, 

सोपान या सीडियो मे पेडी या सिडि की संख्या हमेशा विषम होना चाहिए, 1,3,5,7,9,11,13,15,17,19,21,23,25,27,29,31,33,35इस प्रकार संख्या होनी चाहिए,,

 वास्तुशास्त्र के अनुसार कोणो मे खीडकिया नही होनी चाहिए, तथा जितने दरवाजे हो उतनी हि खिड्किया भी होनी चाहिए,

 मकान मे एक सीध मे तीन दरवाजे नही होने चाहिए,  

नियमानुसाए खिड्कियो की संख्या सम अर्थात 2,4,6,8 होनी चाहिए, 

दक्षिण की दिवार मे नैऋत्य या अग्नि कोण मे खिड्की नही होना चाहिए, 

इसी प्रकार दरवाजो की संख्या भी सम 2’4’6’8 होनी चाहिए तथा पुर्व व उत्तर कि तरफ़ दर्वाजे व खिड्की हो तो ज्यादा शुभ होता है,

 राज मार्तण्ड ग्रन्थ के अनुसार –

राज दून्नतिः पुर्व नते तराणां वास्तौ धनं दझिण भाग तुगं |झयो धनानां विनते प्रतिच्यां उच्चैविर् नाशो ध्रुवं उत्तरेण ||

पुर्व दिशा मे निचा स्थान हो तो उन्नति होती है,  दक्षिण दिशा की ओर उँचा हो तो धन धान्य की वृद्धि होती है, अतः मकान दक्षिण ओर पश्चिम भाग मे उँचा होना चाहिए पुर्व ओर उत्तर का भाग हमेशा निचा होना चाहिए, …
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