ऋषभ देव ने सर्व प्रथम गन्ने के रस का प्रयोग किया 
अयोध्या के राजा नाभि ओर उनकी पत्नी मेरु देवी थी,
कोइ योद्धा अयोध्या के सामने युध्द नही कर सकता था इसी लिये इसका नाम अयोध्या पडा था ,

“अरभिः योद्धं न शक्या इति अयोध्या “

संसार की सबसे पहली नारी मेरू देवी थी जो बिना रजस्वला हुये गर्भवती हुइ थी, ओर गर्भ मे साक्षात् स्वयम् नारायाण हि ऋषभदेव के रूप मे आये थे, 

प्रसव की पुर्व रात्री को मेरू देवी ने सोहल मंगलकारी स्वप्न देखे,  ओर राजा नाभि ने इनका फ़ल बताया, 

1- गज देखने से उत्तम पुत्र होगा.

2- वृषभ देखने से वह जगत गुरु पुत्र होगा .

3- सिन्ह दर्शन से अपुर्व शक्तिशाली होगा.

4- पुष्प माला आदि देखने से वह तिर्थन्कर होगा.5- कमलो का हवन करने से पुत्र सुरुप होगा.

6- पुर्ण चन्द्र देखने से जगत मे लोगो को सुखी करेगा.

7- सुर्य देखने से वह प्रतापी होगा.

 8- कुम्भ युगल देखने से पुत्र निधिपति होगा,.

9- सर देखने से शुभ लक्षण वाला होगा. 

10- मीन युगल देखने से आनंद मय अनुपम गुण होन्गे.

11- सागर देखने से सर्वग्यानी होगा.

 12- सिंहासन देखने से राज्य का स्वामी होगा. 

13- नागेन्द्र भवन देखने से वह अवधी ग्यानी होगा. 

14- सुर विमान देखने से स्वर्ग से विमान आएगा. 

15- रत्न राशि देखने से गुण खजाना होगा. 

16- धुम रहित अग्नि देखने से कर्म ध्वन्सक होगा..

आषाढ़ क्रश्णा द्वितिया को उत्तरा षाढा नक्षत्र मे ऋषभ देव का गर्भ कल्याण्क हुआ,  
तथा चैत्र क्रश्णा नवमी के दिन ऋषभ देव जी का जन्म हुआ,
 पुर्व सन्स्कारो वश ऋषभ देव को जन्म से ही लिपी विद्या, गणीत विद्या, सन्गीत कला, चित्र कला, ग्यात थी, ओर लोगो को सिखाने लगे,  


ॠषभदेव के जन्म के पहले सतयुग मे कल्प वृक्ष हुआ करते  थे , इनसे सारा कार्य जैसे भोजन की व्यवस्था आदि आसानी से हो जाया करते थे, 
लोगो को कोइ उध्योग, खेती आदि कुछ भी नही करने पड्ते थे, .
जब कल्प वृक्ष सुखने लगे तो यह सारी व्यवस्था चरमराने लगी   सारी प्रजा ऋषभ देव के पास गयी,
 तब ऋषभ देव ने विचार किया की भोग भूमि का काल पुर्ण हो गया है, 
अब कर्म भुमी का आरम्भ होगा, 
अब प्रजा को कर्म करने से ही सब चिजो की प्राप्ति होगी इस समय तक लोगो को खेती करना, 
लिखना, पढ़ना, व्यापार आदि करने का कोइ ग्यान ही नही था,, 

पहली बार ऋषभ देव ने तलवार बनाना ओर चलाना लोगो को सिखाया, 
 स्याहि बनाकर लोगो को लिखना सिखाया ,
अपनी रक्षा करना सिखाया, 
इसके पहले खेतो मे कल्प वृक्ष के प्रभाव से बिना बोये हि अन्न उत्पन्न हो जाता था, 
कल्प वृक्ष सुखने से खेतो मे अन्न बोना लोगो को पहली बार ऋषभ देव ने सिखाया, 
खेती के ओजार हल, गेती, फ़ावडा, बनाना ओर इनका उपयोग करना भी सिखाया, 
गन्ने का उपयोग, गन्ना खाना,  गन्ने का रस निकालना, तथा गन्ने के रस से गुड बनाना ये सब ऋषभ देव ने सिखाया, 
इसके साथ हि अलग अलग मकान बनाकर उनमे रहना भी सिखाया, 


इन्द्र को बुलाकर इन्द्र द्वारा प्रिथ्वि पर अंग देश, बंगदेश, कलिंग , सुकोशल, अवन्ति, वत्स, कुरु, पान्चाल, मालवा, काशी,  कश्मीर,  सौराष्ट्र , गुजरात, महाराष्ट्र, विदर्भ, कर्णाटक, केरल, सिन्धु, गान्धार, आदि अनेक देशो प्रान्तो, ग्रामो की रचना करवाइ, 
इन्द्र ने प्रथ्वि पर ग्रामो पुरो की रचना की इसी कारण इन्द्र को तबसे “”पुरन्दर”” कहा जाने लगा ,, 
ऋषभ देव ने प्रजा जनो को कृषि, वाणीज्य, शिल्प, ओर विद्या के इन कार्यो द्वारा आजीविका चलाना सिखाया, 
प्रिथ्वि पर कर्म युग का आरम्भ किया, 
इस कारण ऋषभ देव इस प्रिथ्वि के ब्रह्मा भी कल्हलाये, 
इस रचना द्वारा प्रजा का पालन हुआ, इसी कारण ऋषभ देव को प्रजापति भी कहा जाने लगा, 
गन्ने के रस “इक्षु रस “का उपयोग करना बताया , इसी कारण ऋषभ देव “इक्ष्वाकुल ” भी कहलाये.. 

किसी भी प्रकार के ज्योतिष समाधान के लिए संपर्क करे

ज्योतिष पंडित -सुरेश चंद्र 

9981664508

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