तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की महिमा
अवंतिका नगरी उज्जैन एक प्रसिद्ध रमणीय नगरी है ,
जो समस्त देहधारीयों को मोक्ष प्रदान करने वाली होती है,,
मोक्ष दायिनी सात नगरियो में उज्जैन (अवंतिका )का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है,,
उज्जैन भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है ,
अवंतिका उज्जैन जिस स्थान पर है, वहां प्राचीन काल में एक महावन था जिसका नाम महाकाल वन था,
यह वन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है ,,
यह मातृकाओ का निवास स्थान होने के कारण “पीठ” कहा जाता है,
इस मातृभूमि में मरे हुए जीव पुनः संसार में जन्म नहीं लेते ,,
इसलिए इसे ऊसर ऊसर कहते हैं,
यह महाकाल वन अवंतिका क्षेत्र भगवान भोलेनाथ का ग्रह्य, नित्य ओर प्रिय क्षेत्र कहलाता है ,,
भगवान शिव के इस प्रिय क्षेत्र को “”श्मशान महाकाल वन”” और “”विमुक्ती क्षेत्र “”भी कहते है,
कुरूक्षेत्र से 10 गुनी पुण्यमई “काशीपुरी ” कही जाती है,,
तथा काशीपुरी से भी 10 गुना अधिक महत्व अवंतिका क्षेत्र के महाकाल वन का है ,,,
एक बार देवेश्वर भगवान शिव हाथ में कपाल लेकर संपूर्ण पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे ,,
घूमते घूमते हुए इस “कुश स्थली” महाकाल वन में आ गए,,
इसे “कुश स्थली ” इसलिए कहा जाता है ,क्योंकि यहां पर पूर्व काल में ब्रह्माजी ने उत्तम कुशो और समीधाओ द्वारा अग्निहोत्र हवन यज्ञ किया था ,,
तब से इस उज्जैनी क्षेत्र को “कुश स्थली ” भी कहा जाता है,,
कुश स्थली उज्जैनी में आकर इस महाकाल वन में भगवान शिव जी ने वह कपाल फ़ेक दिया, और 1 वर्ष तक यही निवास किया था,
तब वहां के वृक्षों ने शिव जी से निवेदन किया कि आप इसी महाकाल वन में नित्य निवास करें ,,
तब भगवान भोलेनाथ ने कहा इस क्षेत्र में मेरा नित्य ही निवास रहेगा ,,
इस महाकाल वन में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे जो शुभ कर्म पारायण और वेदों के स्वाध्याय में संलग्न रहते थे,,
वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहते थे ,प्रतिदिन अपने घर में अग्निहोत्र हवन करते थे ,,
वह ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनका पूजन व अभिषेक करते रहते थे ,,
उन ब्राह्मण का नाम वेद प्रिय था,,
उनके 4 पुत्र थे उनके नाम “देव प्रिय , प्रिय मेधा ,सूक्रत और सुव्रत था ,,
वह भी पिता के समान ब्रह्म तेज वाले ही थे,,
इस कारण अवंती नगरी ब्रह्म तेज से पूर्ण हो गई ,,
उस समय रत्न माल पर्वत पर दूषण नामक एक दैत्य था जो अत्यंत बलवान और तीनों लोको को दुख देता था,,
उसने ब्रह्मा जी की तपस्या करके बलशाली होने का वरदान प्राप्त कर लिया था,,
उसने अहंकार में आकर सभी देवताओं को जीत लिया था और तीनों लोकों पर राज्य करने लगा ,,
एक बार उस दूषण दैत्य ने सेना लेकर अवंती उज्जैन के ब्राह्मणों पर चढ़ाई कर दी ,
उसकी आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रकट हो गए,,
ब्राह्मण उनसे डरे नहीं,,परंतु उज्जैनी नगरी के सभी नगरवासी अत्यंत डर गए थे,,
तब सभी देवता लोग ब्रह्मा जी को साथ लेकर भगवान शिव की शरण में गए जब भगवान शिव ने सब को आश्वासन देकर कैलाश से विदा किया,,
इधर उन वेद प्रिय ब्राह्मणों ने सभी नगर वासियों को आश्वासन दिया कि आप लोग भक्तवत्सल भगवान भोलेनाथ पर भरोसा रखो,
और पार्थिव शिवलिंग का पूजन कर वे वेद प्रिय ब्राह्मण भगवान सदाशिव का ध्यान करने लगे ,,
उसी समय पार्थिव शिवलिंग के स्थान में बड़ी भारी आवाज के साथ एक गड्ढा हो गया, उस समय पृथ्वी फटने की आवाज आई हुई उसने तीनों लोक काप गये,,
उस गड्ढे से तत्काल विकट रूप धारी भगवान शिव शंकर प्रकट हो गए जो “”महाकाल”” नाम से विख्यात हुए ,,
भगवान महाकाल ने उस दूषण दैत्य से कहा –
हे दूषण मै तुझ जैसे दुष्टों के लिए कालों का काल महाकाल प्रकट हुआ हूं,,
तुम मेरे इन भक्तों व ब्राह्मणों को क्यों कष्ट दे रहे हो ,तुम इन्हें नहीं मार सकते क्योंकि यह मेरे भक्त हैं,,
“” अकाल मृत्यु वह मरे जो कर्म करे शैतान का
काल भी उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का””
इस प्रकार महाकाल भगवान ने दूषण दैत्य को मार डाला अपने हंकार मात्र से जलाकर भस्म कर दिया,
आकाश में देवताओं ने दुन्दुनिया बजाई और भगवान महाकाल पर पुष्पों की वर्षा की ,,
तब वैदप्रिय ब्राह्मण अपने चारों पुत्रों के साथ भगवान महाकाल की स्तुति करने लगे ,
और प्रार्थना कि-
हे प्रभु आपने यहां प्रकट होकर भक्तों को कृतार्थ किया अब मेरी यह अभिलाषा है कि आप इसी गर्त (गड्ढे ) में मां भगवती पार्वती माता के सहित व अपने गणों सहित यहीं पर निवास करें ,,
दूषण दैत्य का नाश करने वाले आप महाकाल है इसी महाकाल नाम से संसार में प्रसिद्ध हो जाओ और जो भी आप की पूजा करे वे सभी मनोरथ को प्राप्त करे,,,
तब ब्राह्मण की प्रार्थना को स्वीकार करके भगवान शिव ब्राह्मण द्वारा स्थापित लिंगमूर्ति में , उसी गड्ढे में ,उसी पार्थिव लिंग में, अपने पूर्ण अंश महाज्योति सहित प्रतिष्ठित हो गए,,
और “”ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर “” नाम से विख्यात हो गए,, यह भगवान शिव जी का “”तीसरा महा ज्योतिर्लिंग”” है ,,
उस समय ब्रह्मा जी ,विष्णु जी एवं सभी देवताओं तथा वेद ब्राह्मण एवं उनके चारों पुत्रों ने भगवान महाकालेश्वर का विधि विधान से पूजन अभिषेक विभिन्न उपचारों द्वारा विस्तृत रूप से किया,,
वहां के आसपास की चारों ओर की भूमि लिंग रूपी भगवान महाकाल का स्थल बन गई ,,
भगवान महाकालेश्वर का दर्शन करने से स्वप्न में भी कोई दुख नहीं होता ,,
जिस कामना से पूजन किया जाए, उपासना आराधना की जाए उसे वह मनोरथ अवश्य प्राप्त हो जाता है
जय श्री महाकाल

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