प्रदोष व्रत का महात्म्य ओर विधि
त्रयोदशी (तेरस) तिथि को सायं काल को सूर्यास्त के लगभग 1 घंटे पहले से प्रदोष काल प्रारंभ हो जाता है,,
यदि दिन में सायं काल से पहले बारस हो और सायं काल में तेरस तिथि लग जाए तो उसी दिन प्रदोष माना जाता है,,
प्रदोष काल में तेरस तिथि को शिव पूजन का विशेष महत्व होता है ,,व स्वयं ब्रह्मा विष्णु और सभी देवता गण भी शिवजी का पूजन करते हैं ,,और आनंद मगन रहते हैं ,,
इस समय शिवजी का पूजन अभिषेक श्रंगार आदि करने से शिवजी बहुत प्रसन्न होते हैं,,
त्रयोदशी तिथि को सायं काल स्नान करके शुद्ध वस्त्र ,
धवल वस्त्र अर्थात सफेद वस्त्र धारण करें ,,
लाल वस्त्र ,लाल साड़ी ,आदि पहन कर शिवजी का पूजन ना करें यहां तक कि लाल कुम्कुम, लाल वस्त्र ,लाल फल जैसे अनार आदि तथा लाल फूल या लाल फूलों की माला शिवजी को नही चढाना चाहिये,
शिवजी श्वेत रंग को बहुत पसंद करते हैं कर्पूर ,सफ़ेद फ़ुल, दुध, दहि, जैसी सफेद वस्तुओं से भगवान का पूजन करें क्योंकि शिवजी स्वयं
“”कर्पूर गौरम करुणावतारं संसारसारं “”है
अर्थात कपूर जैसा गौर वर्ण है शिव जी का ,भगवान शिव जी के वाम भाग में गोरी मां पार्वती जी होती है उनका भी पूजन करें ,,
शिवजी का पूजन करके रुद्र पाठ करें तथा संभव हो तो प्रदोष स्त्रोत का पाठ करें,,
या प्रदोष अष्टक का भी पाठ कर सकते हैं,,
शिव जी और पार्वती जी दोनों के निमित्त वस्त्र दान करें,,
पार्वती जी के निमित्त सुहाग श्रंगार की भी समस्त सामग्री चढ़ावे ,,
शिव जी के पूजा के पुजारी का भी सपत्नी पूजन करें सपत्नी पुजारी ही साक्षात्कार शिव पार्वती माने जाते हैं ,,
इनके अवहेलना करने से शिवजी तुरंत नाराज होकर मूर्ति शिव लिंग में से अदृश्य अंतर्ध्यान हो जाते हैं,,
षोडषॊपचार से पूजन करें शिवजी को प्रसन्न करें,, ओर प्रार्थना करे –
जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत ,
जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्व सुरार्चित,
जय गौरी पते शंभॊ, जय चंद्रार्धशेखर ,
सर्व पाप भयम हत्वा रक्षमाम परमेश्वरम l l
उज्जैन नगरी में चंद्रसेन नामक एक राजा थे,वे प्रत्येक मास में त्रयोदशी तिथि प्रदोष वाले दिन सायं काल में महाकालेश्वर भगवान शिव जी का यथोचित पूजन अभिषेक किया करते थे,
1 दिन भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर राजा को एक चिंतामणि नामक मणि प्रदान की,,
जिससे वह संपूर्ण विपत्तियों से छूटकर अतुलनीय आनंद को प्राप्त हुए,,
तब देश देश के राजाओं ने आकर मणि राजा से मांगी परंतु राजा ने वह मणि किसी को नहीं दी,,
तब सब ने मिलकर उज्जैनी को चारों ओर से घेरकर आक्रमण करने की तैयारी कर ली,,
तब तेरस के दिन सायं काल प्रदोष काल में राजा रानी भगवान शिव का पूजन करने लगे उसी समय एक ग्वालन गोपी अपने 5 वर्ष के बालक को लेकर मंदिर में आई,,
उस बालक ने राजा के द्वारा की गई संपूर्ण पूजा विधि को देखा,,
ओर घर जाकर एक छोटे से पत्थर के टुकड़े को एक शिवलिंग मानकर भक्ति भाव से श्रद्धा पूर्वक प्रदोष काल में शिवजी का पूजन करने लगा,,
भगवान ने उसके घर व उसके मंदिर को हीरे जवाहरात से भर दिया ,स्तम्भ ,कीवाड, दीवार आदि सब रत्नों से जड दिए,,
यह समाचार सुनकर सभी राजाओं ने अस्त्र सस्त्र त्याग कर राजा चंद्रसेन के शरणागत हो गए ,,
उसी समय वहां पर हनुमान जी प्रकट हुए और कहने लगे तुम सब लोग भी भगवान शिवजी की पूजा किया करो,
जब त्रयोदशी को प्रदोष वाले दिन शनिवार हो तो इसका विशेष महत्व होता है ,,
दोनों पक्षों की त्रयोदशी प्रदोष में व्रत रखकर प्रदोष काल में शिवजी का पूजन करना चाहिए,,
उस ग्वालिन के बेटे को हनुमान जी ने कहा इस बालक के 8 वीं पीढ़ी में नंदबाबा नाम के गोप उत्पन्न होंगे,,
उनके घर उनके घर भगवान विष्णु आनंदकंद सच्चिदानंद वृंदावन बिहारी भगवान “श्री कृष्ण “रुप से अवतार ग्रहण करेंगे ,,आज से इस गोप बालक का नाम श्रीकर होगा ,,
जो व्यक्ति प्रदोष व्रत धारण करता है वह कभी भी दरिद्र नहीं होता,,
त्रयोदशी प्रदोष व्रत की अवहेलना त्याग कर देने से ,या प्रदोष काल में ब्राह्मणों का अपमान करने से मनुष्य को जीवन में कभी भी सुकून नहीं मिलता है,,
त्रयोदशी के दिन शनिवार हो तो उस दिन से संतान प्राप्ति हेतु प्रदोष व्रत आरंभ कर 1 वर्ष तक दोनों पक्षों को प्रदोष का व्रत करना चाहिए, इससे संतान अवश्य होगी ,,
ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी लवन रहित भोजन करें,,
श्रावण मास में शिव जी का नाम “शूलपाणि” होता है,
इस मास में कमल पुष्प सफेद( कमल पुष्पों तो अति उत्तम) शिव जी को चढ़ाने चाहिये,,
और रात्रि को पूजन के पश्चात मालपुए का भोजन करना चाहिए,,,….
जय श्री महाकाल..

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