नंदी शिव जी के ही अवतार है
शिलाद नाम के एक धर्मात्मा मुनि थे ,
उनकी कोई संतान नहीं थी,
उन्होंने अपने पितरों का पूजन किया, पितरों के आदेश से उन्होंने बिना माता के गर्भ से अर्थात स्वयं उत्पन्न होने वाला पुत्र की कामना से देवेश्वर इंद्र को प्रसन्न किया ,,
परन्तु इन्द्र ने ऐसे पुत्र का वरदान देने में असमर्थता प्रकट की और शीलाद मुनि को भगवान शिवजी की आराधना , तप करने को कहा,
क्योंकि शिव जी ने काल मृत्यु को भी जीत लिया है वह “मृत्युंजय” कहलाते हैं ,
तब शीलाद मुनि ने तप करके भगवान सदा शिव को प्रसन्न किया ,,
भगवान शिव पार्वती जी सहित प्रकट हो गए,
शिलाद मुनि ने वही अयोनिज व कभी न मरने वाले पुत्र की याचना की तो भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये, ओर कहा हे शिलाद मुनि मुझे अवतार लेना ही है,
अतः मै स्वयम तुम्हारे यहा पुत्र रुप मे प्रकट होउन्गा,
क्योकि ब्रह्मा जी ओर मुनियो तथा देवताओ ने मेरे अवतार लेने के लिये मेरी आराधना की है, वे भी चाहते हैं की मै अवतार धारण करु अतः हे शिलाद मुनि यद्यपि मै सारे जगत का पिता हूँ,
परन्तु तुम मेरे पिता बनोगे, उस समय मेरा नाम “नन्दी” होगा
कुछ समय बाद शिलाद मुनि ने एक यग्य किया तब उस यग्य कुण्ड के बिच से प्रलय काल की अग्नि के समान देदीप्यमान शिव जी प्रकट हो गए,
उस समय उनका स्वरूप एसा था कि उसे देखने पर तीनो लोक मोहित हो रहे थे,
हाथो मे शुल, शन्ख, गदा, ओर असि -तलवार तथा कानो मे कुण्डल विराजमान थे,
देखने मे बालक के समान दिख रहे थे, उस समय आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी, देवता स्तुति करने लगे,
शिलाद मुनि को भी आनन्द की प्राप्ति हुइ, तथा आनन्द मग्न होकर सआनन्द उस बालक से बोले -हे पुत्र तुमने मुझे अत्यन्त आनन्द प्रदान किया है,
इसलिए तुम्हारा नाम “नन्दी” होगा,
बाद में नन्दी ने अपना स्वरूप छोडकर एक बालक के रूप मे परिवर्तित हो गये,,
शिलाद मुनि के घर आकर नन्दी बालको के समान क्रिडा करते रहे,
जब बालक नन्दी 10 वर्ष के हो गये तब शिव जी ने मित्रा ओर वरुण नामक दो मुनियो को बुलाकर अछी तरह समझा कर शिलाद मुनि के यहा भेजा, वहा जाकर दोनो मुनियो ने शिलाद मुनि से कहा तुम्हारे पुत्र की आयु बहुत कम है,
इतना कह कर दोनो मुनि चले गए,
तब शिलाद मुनि पुत्र नन्दी से लिपट कर रोने लगे, ओर मुर्छित होकर जमिन पर गिर पडे,
तब नन्दी ने समझाया कि मै शिव जी की आराधना करके काल को भी जीत लुन्गा,
ओर तभी भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गये ओर नन्दी से कहा कि हे नन्दी तुम्हे मृत्यु का कोइ भय नही है, तुम साक्षात् मृत्युन्जय हो,
इतना कह कर शिव जी ने नन्दी के शरीर को स्पर्श किया उसी समय नन्दी को शिव जी ने अपनी माला पहना दी,
ओर बोले नन्दी तुम सदा मेरे गणनायक बने रहोगे,
तुममे मेरे हि समान बल होगा ,
तुम नित्य मेरे पार्श्व भाग मे स्थित रहोगे,
उस समय नन्दी तीन नेत्र ओर दस भुजाओ वाले हो गये,
तब भगवान शिव ने नन्दी को अपने शिव गणो का अध्यक्ष बना दिया, ओर नन्दी हमेशा कैलाश में ही रहने लगे,
इस प्रकार नन्दीश्वर तो भगवान शिव का एक प्रधान अवतार ही है,,
जय श्री महाकाल

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