12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम सोमनाथ का प्राकट्य एवं महत्व
पृथ्वी पर वैसे तो लाखों शिवलिंग है ,हजारों मंदिर है इनमें बहुत प्रसिद्ध एवं प्राचीन शिव मंदिर भी है ,
जैसे च्यवन ऋषि की तपोभूमि में चंद्रकेश्वर ,करनावद में कर्णेश्वर , विजेश्वर के कारण विजयवाड़ा नगर का नाम हुआ जो इंदौर से नेमावर के बीच में है ,
इंदौर से बिजलेश्वर्व महादेव के कारण कॉलोनी का नाम बिजली नगर हुआ,
धारेश्वर के कारण धार नगरी वर्तमान में धार इसी कारण से प्रसिद्ध है ,,
परंतु 12 द्वादश ऐसे शिवलिंग है जिनको ज्योतिर्लिंग कहा जाता है इनका विशेष महत्व है-
सोमनाथ ,मल्लिकार्जुन, महाकाल ,ओम्कारेश्वर, ओमकारममलेश्वर, वैद्यनाथ, भीमाशंकर ,रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथ ,त्र्यंबकेश्वर ,केदारनाथ ,आदि..
इनमें सर्वप्रथम सोमनाथ सोमेश्वर गुजरात सौराष्ट्र में है,,
चंद्रमा (सोम ) द्वारा स्थापित होने से “सोमनाथ” कहलाए..
एक बार राजा दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चंद्रमा से किया ,,
यह 27 कन्या चंद्रमा की पत्नियां ही “27 नक्षत्र “है ,,
जो इस प्रकार से है –
1 अश्विनी
2 भरणी
3 कृतिका
4 रोहिणी
5 म्रगशीरा
6 आद्रा
7 पुनर्वसु
8 पुश्य
9अश्लेषा
10 मघा
11 पूर्वाफाल्गुनी
12 उत्तराफाल्गुनी
13 हस्त
14चित्रा
15स्वाति
16 विशाखा
17 अनुराधा
18जेष्ठा
19 मूल
20 पूर्वाषाढ़ा
21 उत्तराषाढ़ा
22 श्रवण
23 धनिष्ठा
24 शतभिषा
25 पूर्वाभाद्रपदा
26 उत्तराभाद्रपदा
27 रेवती
इस प्रकार चंद्रदेव नक्षत्रों के अधिपति हुए,,
परंतु वे केवल चौथी पत्नी रोहिणी से ही अधिक प्यार करने लगे ,,
अधिकांश रूप से रोहिणी के ही महल में रहने लगे,
रोहिणी चंद्रमा की सर्वश्रेष्ठ पत्नी हो जाने से उसकी राशि वृषभ में चंद्रमा उच्च के हो जाते हैं ,,
अन्य सभी 26 पत्नियों ने चंद्रमा की है शिकायत अपने पिता दक्ष प्रजापति से कर दी,,
तब राजा दक्ष ने क्रोध मे चंद्रदेव को क्षय रोग होने का श्राप दे डाला ,,
इससे चंद्र देव का शरीर दिन प्रतिदिन छय होने लगा,,
तब सारे देवता चंद्रमा को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछने लगे,,
तो ब्रह्मा जी ने बतलाया कि सौराष्ट्र देश गुजरात में प्रभास क्षेत्र में जाकर चंद्रमा शिव जी की तपस्या करना चाहिए जिससे इनका शरीर तजोमय होकर पूर्णता को प्राप्त कर प्राप्त होगा ,,
तब चंद्रमा ने गुजरात में ,आज जहां सौराष्ट्र मंदिर है वहां जाकर अपने हाथ से शिवलिंग की स्थापना करी
और भगवान शिव की कठोर आराधना करने लगे ,,
6 माह तक कठिन तप किया तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए तब चंद्रदेव ने कहा हे भोलेनाथ आप मेरे झय को दूर कर दो,,
और मुझे सदैव आपकी भक्ति प्राप्त हो एसा वरदान मुझे दे दो,,
तब भगवान शिव जी ने कहा तुम कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक-एक कला से झय होते होते अमावस्या तक पूर्ण रूप से झय रहोगे ,,
परंतु शुक्ल पक्ष में पुनः एक कला से वृद्धि को प्राप्त हो जाओगे ,,इस प्रकार पूर्णिमा तिथि को अपने पूर्ण अस्तित्व में रहोगे,,
इस प्रकार भोलेनाथ ने चंद्रमा को वरदान दिया और ब्रह्मा जी विष्णु भगवान तथा इंद्र आदि देवताओं के कहने पर अपने तेज अपनी ज्योति को उस लिंग में जिसे चंद्रमा (सोंम) ने प्रतिष्ठित किया था उसमे प्रवेश करा दी,,
शिवजी अपने पूर्ण रूप से गिरिजा सहित उसी स्थान पर प्रतिष्ठित हो गए ,,
ब्रह्मा विष्णु और सभी देवताओं ने वहां सोमनाथ सोमेश्वर शिवलिंग की पूजा की वहा पास ही चंद्रमा का बनाया हुआ कुंड भी है,,
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए,
इनका पूजन करने से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है ,,
सोमनाथ का पूजन करने से क्षय रोग टीबी की बीमारी से मुक्ति मिल जाती है,,
इसी प्रकार कुष्ठ रोगों से भी छुटकारा मिल जाता है वहा चंद्रमा का बनाया चंद्र कुंड के जल से स्नान करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है,,,….
जय श्री महाकाल

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