कावड़ यात्रा के शुभारंभ पर विशेष
सावन मास में सर्वत्र कावड़ यात्रा जगह-जगह पर निकलती है कावड़ में दो कलश, मटके या डीब्बीया किसी पवित्र नदी या तीर्थ स्थल से भरकर लाते हैं,,
और एक नियत स्थान पर पवित्र जल शिव जी को चढ़ाया जाता है ,,
सभी अपने -अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों में इस प्रकार का जल चढ़ाते हैं जो पवित्र जल भर -भर कर कावड उठा कर चलते हैं वह पवित्र अवस्था में रहते हैं ,,
नियत स्थान पर पडाव दिया जाता है,,
विशेष नियम यह है कि कावड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है ,
शाम को सभी कावड़ एक जगह जमीन से ऊपर किसी स्थान पर रखी जाना चाहिए,,
फ़िर कावड़ लाने वाले स्नान करके अपनी अपनी कावड़ की पूजा करें ,आरती करें ,
भोजन बनने पर पहले नैवेद्य (भोग) लगाकर फिर स्वयं भोजन करें ..
सुबह उठकर स्नान करके अपनी कावड़ का पूजन आरती करके कावड़ को साष्टांग प्रणाम कर कावड़ उठाकर यात्रा प्रारंभ करें,,
अर्थात संपूर्ण मार्ग में कांवड के जल को पृथ्वी (जमीन) से स्पर्श ना होने दें ,
अन्यथा कावड़ का फल नष्ट हो जाता है ,,
इसलिए कई लोग खड़ी कावड़ लाते हैं कुछ-कुछ दौड़ते हुए कावड़ लाते हैं इसका महत्व और भी ज्यादा है
इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि–
दशानन रावण कावड में दो शिवलिंग कैलाश पर्वत से लेकर लंका जा रहे थे,,
तब लघुशंका आने से अपनी की वजह से वह कावड़ उन्होंने एक गाय चराने वाले को दी और रावण लघुशंका करने चल लगे ,,
परंतु वह शिवलिंग वाली कावड़ वह ग्वाला जमीन पर रखकर चला गया अतः वे शिवलिंग वहीं ठहर गये,,
रावण के साथ लंका नहीं गए ,,
यही प्रमुख कारण है कि यदि कावड़ जमीन पर रख देंगे तो उसका महत्व नष्ट हो जाता है ,,
एक बार रावण ने भगवान शिवजी को प्रसन्न किया और निवेदन किया कि आप मेरी लंका में मेरे साथ चल कर निवास करें,,
शिव जी ने कहा कि तुम मेरे आत्मलिंग को ले जाकर लंका में स्थापित कर दो,,
तब रावण ने निवेदन किया कि हे भोलेनाथ आप मुझे अपने दो आत्म लिंग प्रदान करें में दोनों को लंका में स्थापित करूंगा,,
तब स्वयं भगवान भोलेनाथ ने अपने दो आत्मलिन्गो को प्रकट करके रावण को प्रदान करते हुए कहा कि —
रावण यह लिंक दिव्य है इन्हें बीच रास्ते में कहीं भी जमीन पर मत रखना नियत स्थान लंका में ही जाकर स्थापित करना,,
कहीं चाहे घनघोर जंगल ही क्यों ना हो,,
यदि जमीन पर रख दिया तो यह वही उसी स्थान पर ही रह जाएंगे, वहां से हीलेंगे भी नही,
तब रावण ने एक कावड़ बनाई और उसमें दोनों भाग में एक-एक शिवलिंग रखकर कंधे पर कावड उठा कर चले तब, शिवजी क्योंकि लंका जाना नहीं चाहते थे,
अतः रावण को लघुशंका के लिए प्रेरित किया,,
उसी समय रावण को एक बैज नाम का ग्वाला दिखाई दिया तब रावण ने अपनी कावड़ उस ग्वाले को थमा दी और लघुशंका करने चले गए,,
शिव जी ने अपना भार बढ़ाया जिसे ग्वाला सहन न कर सका और कावड़ जमीन पर रखकर वहां से चला गया ,,
तब शिवलिंग वहीं स्थापित हो गए और रावण के साथ नहीं गए …,
इसीलिए कावड़ यात्रियों के लिए भी यह एक विशेष नियम है कि उन्हे अपनी कावड स्वयं को ही धारण करना चाहिए,,,..
अपनी कावड दूसरे को देने से भी कावड़ का फल नष्ट हो जाता है ,,
बैज नाम के ग्वाले ने कावड़ जमीन पर रखी
अतः कावड़ के पिछले भाग वाले शिवलिंग “बैजनाथ” के नाम से प्रसिद्ध हो गए और कावड़ के अगले भाग वाले शिवलिंग “चंद्रपाल” शिवलिंग के नाम से विख्यात हो गए…
इस प्रकार सर्वप्रथम रावण ने कावड़ बनाई और उसमें शिवजी के आत्म लिंग को उठाकर चले गए थे ,,
तभी से यह कावड़ यात्रा का प्रारंभ हुआ है ,,
कालांतर से पवित्र नदी नर्मदा ,शिप्रा ,गंगा ,आदि नदियों से जल भरकर कावड उठा कर लाते है ,और शिव जी पर वह जल चढ़ाया जाता है क्योंकि शिवजी के कारण ही सर्वप्रथम कावड़ बनी थी…..
जय श्री महाकाल

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