जैन धर्म मे 24 तीर्थन्कर हुये है, उनमे सर्व प्रथम पहले तीर्थन्कर ऋषभनाथ हुये, इसलिये उन्हे आदित्य नाथ भी कहते हैं,
तिर्थ का अर्थ् होता है पवित्र तथा कर अर्थात करने वाला, इस प्रकार जो अपने आचरण व्यव्हार से जगत को पवित्र करने वाले होते हैं – उन्हे तिर्थन्कर कहा जाता है, तिर्थन्करो की इसी श्रृंखला मे आगे चलकर सोलहवे तिर्थन्कर “शान्ति नाथ”जी महाराज हुये ,
“निज वैभव कर प्राप्त आपने पायी शान्ति अनंत l
ध्योते हैं हे नाथ मांगते हम भी भव का अंत ll
चक्रवर्ती पद छोड प्रभो, पहुचे शिवपुर धाम l
जीवो को शांति प्रदान कर, पहुचे पद निर्वाण” ll
भरत क्षेत्र मे हस्तिनापुरी मे ऋषभ देव जी को प्रथम पारणा आहार दान सोमप्रभ राजा ने प्रदान किया था,
वहा दोनो भाइ श्रेयान्स कुमार ओर सोमप्रभ ने प्रथम आहार दान किया था,
आहार दान का प्रारम्भ सबसे प्रथम हस्तिनापुरी से हि हुइ थी,
आज भी हस्तिनापुर जैन धर्मावलंबीयो का पावन तीर्थ है ,
गंगा के उस पार इस तिर्थ मे भीम की गदा आदि अन्य आयुध रखे हुये है, आगे इन्ही सोमप्रभ राजा के वंश मे कुरुवन्श मे विश्वसेन राजा ओर उनकी रानी आचिरा देवी के यहा भाद्रपद क्रश्णा सप्तमी को इनका गर्भ कल्याण्क हुआ,
जन्म तिथी के ही एक दिन दर्पण मे इनको पहले जो रुप दिखायी दिया दुसरे ही क्षण वह रुप बदल गया, तब इन्हे शरीर की क्षण भन्गुरता का ग्यान हुआ ओर वैराग्य उत्पन्न हो गया,
श्री शांति नाथ महाराज को प्रथम आहार दान मन्दिर पुरी के राजा सुमित्र ने दिया था,
15वे तिर्थन्कर ‘ श्री धर्म नाथ ‘ जी के बाद कई वर्ष तक जैन धर्म का विछेद हो गया था,
एक प्रकार से नष्ट हि हो गया था या विलुप्त हो गया था, एक वह शान्ति नाथ अवतार से हि पुनः प्रारम्भ हुआ,
पुनः जैन धर्म की परम्परा चलने लगी ओर आज तक चल रही है, इसके बाद से बिच मे कभी भी जैन धर्म का विछेद नही हुआ,
आज धर्मशासन जैन धर्म प्रवर्तमान है , उसके आध्य गुरु भगवान शान्तिनाथ जी ही है,
” देहे नाभि हितस्त्वनेन समगा दव्या हत: सावधि l
तत् शान्ति समुपेत तत्र भवताम आध्यम गुरुम धीधना: ll
शान्ति मे जितनी शक्ति है क्रोध या राग मे नही छ: खण्ड साधने मे 800 वर्ष लगे थे,
पोष शुक्ल एकादशी के दिन भगवान शान्ति नाथ जी को कैवल्य ग्यान – आत्म तत्व का ग्यान प्राप्त हुआ था,
चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया..
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