यह दुनिया, यह रिश्ते, यह लोग… सब मतलब के हैं। जब जीवन में सब कुछ अच्छा चलता है, तो भीड़ होती है। दोस्त, रिश्तेदार, सब साथ खड़े होने का दावा करते हैं। लेकिन जब समय बदलता है, जब दुख का अंधेरा छा जाता है, जब हम सबसे ज्यादा अकेले होते हैं, तब ये सारी भीड़ गायब हो जाती है। दरवाजे बंद हो जाते हैं, फोन नहीं उठते, और हर कोई अपनी दुनिया में खोया हुआ लगता है।

क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है? वो अकेलापन जो दिल को अंदर तक हिला देता है।

लेकिन इसी अकेलेपन में एक आवाज़ सुनाई देती है। एक एहसास होता है। एक हाथ धीरे से आपके कंधे पर आता है। वह हाथ किसी इंसान का नहीं, बल्कि मेरे साँवरे श्याम बाबा का होता है।

जब सारी दुनिया आपको भूल जाए, तब मेरे श्याम आपके सबसे करीब होते हैं। जब सारे दरवाजे बंद हो जाएँ, तब श्याम बाबा अपने खाटू के द्वार खोल देते हैं। उनकी चौखट पर जाकर जब हम अपना दुख सुनाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी अपने की गोद में सिर रख दिया हो।

दुनिया कहती है, “हिम्मत रखो।” श्याम बाबा कहते हैं, “तू बस मुझे देख, बाकी सब मैं संभाल लूँगा।”

यह सिर्फ एक आस्था नहीं, बल्कि एक विश्वास है। एक अटूट भरोसा है कि जब कोई सहारा नहीं दिखता, तब भी एक शक्ति है जो हमें थामे रहती है। वह है मेरे खाटू नरेश, मेरे श्याम बाबा।

“हार का वो साथी, बस तू ही तो है, जब कोई ना हो, बस तू ही साथ है।”

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