आठवां ज्योतिर्लिंग नागेश्वर

प्राचीन काल में दारुका नामक एक राक्षसी थी ,
जिसने पार्वती जी के नाम से घोर तप किया तब पार्वती जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया…


तब दारूका ने वर मांगा कि मुझे एक ऐसा नगर दीजिए जिसमें मैं अपने पति सहित निवास करूं ,
ओर मे जहां भी जाऊं वहां वह नगर भी मेरे साथ जाए और हे देवी आप सदैव मेरी रक्षा करें….

इस प्रकार एक नगर को प्राप्त कर वह दारुका राक्षसी अपने दारुक नामक राक्षस पति के साथ में वहा रहने लगी ,,

तब वो लोग उस नगर के साथ जाकर लोगों को कष्ट देने लगे ऋषि ,मुनि ,संत ,ब्राह्मणों का अनादर ,तिरस्कार करते लगे.

जब सभी देवता ऋषि मुनि, उनके  आतंक से अत्यंत दुखी हो गए ,
तब ऋषि मुनि लोग एक ओर्व नामक केे मुनि के पास गए जो शिव जी के परम भक्त थे..


ओर्व मुनि ने उस राक्षसॊ पर क्रोधित होकर उन राक्षसों  को यह श्राप दिया कि यदि तुम पृथ्वी के जिवो को मारोगे और यज्ञ ,तप ,आदि धर्म कार्यों में विघ्न डालोगे तो,  तुम स्वयं नष्ट हो जाओगे..

तब दारुका राक्षसी अपने नगर सहित समुद्र में जाकर रहने लगी ..
सारे राक्षस भी उसके साथ ही चले गए समुद्र में चलने वाली बहुत सी नावो को इन राक्षसों ने पकड़ लिया और अपने नगर में ले गये.


उन नावो में एक यात्री शिव जी का परम भक्त था ,
उसका नाम  सुप्रिय  था ,वह वैश्य था ..
वह भगवान शिव की पूजा किए बिना कुछ भी खाता पीता नहीं था ,,
उसके बहुत सारे साथी भी इस प्रकार शिवजी का पूजन करते थे…


और ओम नमः शिवाय का जाप करते थे .
सुप्रिय को कई बार भगवान शिव के दर्शन हो गए थे ,,

जब दारुक राक्षस को इसका पता चला तो वह उन शिवभक्त सुप्रीय को डराने धमकाने लगा ,,
साथ के राक्षस सुप्रिय को मारने दौड़े, तब सुप्रिय ने आशुतोष भगवान शिव शंकर को पुकारा, और निवेदन किया,
हे  देवेश्वर हमें इस दारुक राक्षस से बचाइए प्रभु ,,
में आपका ही हूं ,आप के अधीन हूँ ,रक्षा कीजिए….

तब भगवान शिव एक गुफा में से प्रकट हो गए उनके साथ ही 4 दरवाजे वाला एक मंदिर भी प्रकट हुआ..

उसके मध्य भाग में अद्भुत ज्योतिर्मयी शिवलिंग प्रकाशित हो रहा था.
और उसने नंदी जी ,गणेश जी, पार्वती जी ,कार्तिकेय जी आदि शिव परिवार भी था ..
उसी समय भगवान शिव ने वहां उपस्थित सभी राक्षसों को तुरंत ही मार डाला,,


उसी समय दारूका नामक राक्षसी वहा तुरंत आ गयी,
और पार्वती माता का ध्यान पूजन करने लगी..

तब पार्वती माता ने कहा है दारूका में तेरे  कुल की रक्षा करूंगी ,युग के अंत तक यहां तामसी शक्तियां निवास करेगी.

शिव जी ने कहा जो पुरुष  यहां वर्णधर्म के पालन में तत्पर होकर मेरा दर्शन करेगा ,वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा,
कलयुग के अंत में महासेन का पुत्र वीरसेन चक्रवर्ती राजा बनेगा .


उसी समय भगवान शिव और पार्वती जी अपने ज्योतिर्मयी रूप से उस शिवलिंग में समा गए ..
और इस दारुकवन में भोलेनाथ आठवें ज्योतिर्लिंग के रूप में “नागेश्वर ज्योतिर्लिंग” रूप से विख्यात हो गए…

ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेश चंद्र
श्री रुद्रेश्वर महादेव मन्दिर कैलाश पुरी इंदौर

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