त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे स्कंद पूराण के रैवा खंड मे इसका विस्तार से वर्णन मिलता है, 
21कल्पो में नर्मदा की उत्पत्ति कैसे हूई इसका सम्पूर्ण विधान नर्मदा पूराण में वर्णित है ,

 नर्मदा मैय्या अपने जल में लिन हुये, दिन हूये हीन मीनो को अन्त में स्वर्ग देने वाली है, समस्त तीर्थो मे अग्रगण्य , मच्छ, कच्छ आदि जलचरो तथा चकवा चकवी नभचरो को भी सदैव सूख देने वाली है ,, 

सूमत्स्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक शर्मदे त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ..

नर्मदा मैय्या अमरकंटक से एक पर्वत पर स्थित कुण्ड से निकली है ..जिस पर्वत का नाम मैकल पर्वत है इसी कारण नर्मदा जी का ऐक नाम मैकलसूदा है , भगवान शिव जी ने इस पर्वत पर तप किया था.. 

अमरकंटक से उत्तर दिशा में नर्मदा किनारे ज्वालेश्वर तीर्थ है. यहा ज्वाला नदी नर्मदा से मिली है , एक बार भगवान शिव ने बाणासूर के तीन पूरो त्रिपूरो को भस्म कर दिया था इसिलीये शिव जी त्रिपुरारि के नाम से जाने जाते है , इन तीनो पूरो में से एक जलता हूआ आया और यहा गीर गया इसी वजह से यहा ज्वाला नदी प्रकट हुई थी..

 यहा के शिव जी ज्वालेश्वर कहे जाते हैं.. 
नर्मदा जी के इस ज्वाला संगंम मे गायत्री मंत्र का बहूत महत्व है..

नर्मदा किनारे अनेको स्थान मन को मुग्ध कर देने वाले हैं दिन स्थानो को बस देखते ही जाये, उनमे हि बस जाये… 
हर हर नर्मदे ..

ज्योतिष पंडित – सुरेश चंद्र 

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from Jai Shree Mahakaal

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading