अक्सर लोग भगवान श्रीराम, हनुमान जी और देवी दुर्गा के युद्धों के बारे में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि माता सीता ने भी एक शक्तिशाली राक्षस का अंत किया था।
यह कथा केवल शक्ति और युद्ध की नहीं, बल्कि माता सीता के दिव्य और तामसी स्वरूप का अद्भुत रहस्य भी बताती है।

सीता जी द्वारा मुलकासुर राक्षस का वध
रामायण काल के बाद की यह रहस्यमयी कथा पुराणों में वर्णित मिलती है। कहा जाता है कि रावण के भाई कुम्भकर्ण का एक पुत्र था, जिसका जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार उस समय मूल नक्षत्र को अशुभ माना जाता था। इसी कारण कुम्भकर्ण ने अपने सेवकों के माध्यम से उस बालक को वन में छोड़ दिया।
मधुमक्खियों ने की राक्षस बालक की रक्षा
वन में अकेला पड़ा वह बालक भूख और प्यास से तड़प रहा था। तभी प्रकृति ने उसकी रक्षा की। कहा जाता है कि मधुमक्खियाँ उसके मुख में शहद की बूंदें डालकर उसका पालन करती रहीं। वृक्षों की जड़ों और वन की शक्तियों के सहारे वह धीरे-धीरे बड़ा हुआ।
मूल नक्षत्र में जन्म लेने और वृक्षों की जड़ों के सहारे पालन होने के कारण उसका नाम पड़ा — “मुलकासुर”।
पिता और रावण की मृत्यु का बदला लेने की प्रतिज्ञा
जब मुलकासुर बड़ा हुआ, तब उसे पता चला कि भगवान श्रीराम ने उसके पिता कुम्भकर्ण और रावण का वध किया था। यह सुनकर उसके मन में क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि भड़क उठी।
उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया, लेकिन साथ ही यह भी निश्चित कर दिया कि उसकी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों ही होगी।
ऋषि का श्राप
एक दिन क्रोध में आकर मुलकासुर ने एक ऋषि के सामने माता सीता के बारे में अपमानजनक शब्द कह दिए। उसने कहा:
“सीता के कारण ही मेरे कुल का विनाश हुआ है।”
यह सुनकर ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने श्राप दिया:
“जिस माता सीता को तू दोष दे रहा है, वही तेरे अंत का कारण बनेगी।”
लंका पर आक्रमण
प्रतिशोध की आग में जलता हुआ मुलकासुर लंका पहुंचा। उसने विभीषण पर आक्रमण कर दिया और कहा कि पहले वह विभीषण को मारेगा, फिर अयोध्या जाकर श्रीराम से बदला लेगा।
कहा जाता है कि छह महीने तक विभीषण और मुलकासुर के बीच भयंकर युद्ध चलता रहा। अंत में विभीषण किसी तरह अयोध्या पहुंचे और भगवान श्रीराम से सहायता मांगी।
श्रीराम भी नहीं कर पाए वध
भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण और अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध शुरू किया। लंबे समय तक युद्ध चलता रहा, लेकिन कोई भी मुलकासुर को पराजित नहीं कर सका।
तब स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने श्रीराम को बताया:
“मुलकासुर का अंत केवल माता सीता के हाथों ही संभव है।”
माता सीता का तामसी रूप
इसके बाद माता सीता को युद्धभूमि में बुलाया गया। जब उन्होंने मुलकासुर का अहंकार और अत्याचार देखा, तब उनके भीतर से एक भयंकर तामसी शक्ति प्रकट हुई।
यह स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और उग्र था। उस शक्ति को “चंडी सीता” कहा गया।
चंडी स्वरूप धारण कर माता सीता ने मुलकासुर से युद्ध किया और अंत में “चंडिकास्त्र” का प्रयोग कर उसका वध कर दिया।
युद्ध समाप्त होने के बाद वह दिव्य शक्ति पुनः माता सीता के शरीर में समा गई।
कथा से मिलने वाली सीख
यह कथा हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देती है:
- स्त्री शक्ति को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए
- अधर्म और अहंकार का अंत निश्चित होता है
- ईश्वर का हर रूप समय आने पर धर्म की रक्षा करता है
- क्रोध और प्रतिशोध मनुष्य के विनाश का कारण बनते हैं
निष्कर्ष
माता सीता केवल करुणा और पतिव्रता का प्रतीक ही नहीं थीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वे शक्ति और संहार का रूप भी धारण कर सकती थीं। मुलकासुर वध की यह कथा देवी शक्ति और धर्म की विजय का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।
यह कथा हमें याद दिलाती है कि जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब दिव्य शक्ति स्वयं उसका अंत करने के लिए प्रकट होती है।
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