भगवान सदा शिव के लिंग पूजन का महत्व
सभी देवी देवता जैसे – ब्रह्मा, विष्णु ,महेश, कार्तिकेय ,श्री राम ,कृष्ण भगवान, मां दुर्गा आदिशक्ति की मूर्ति की पूजा होती है ,,
परंतु भगवान शिव का मूर्ति और शिवलिंग दोनों का पूजन होता है ओर लिंग पूजन को ही विशेष महत्व मिलता है,,
क्योंकि भगवान शिव ब्रह्म रूप होने के कारण निष्कल निराकार निर्गुण कहे जाते हैं ,
तथा रूपवान होने के कारण में शकल सगुण कहा जाता है, इस प्रकार भगवान शिव निराकार और साकार दोनों ही है,,
शिवजी के निराकार होने के कारण उनकी पुजा लिन्ग रुप में ही अधिकांश की जाती है ,,
“शिवलिंग”, शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है,,
शिवलिंग साक्षात धर्म का प्रतीक है ,
एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों को ही मोह उत्पन्न हो गया और दोनों एक दूसरे से अपने आप को श्रेष्ठ मानने के लिए परस्पर विवाद करने लगे ,,
दोनों ही अपने आप को पुरे सन्सार का स्वामी समझने लगे,
तब उस समय दोनों के सामने शिव जी का परम तेज प्रकट हुआ,,
और उस तेज का आदि और अनंत जानने के लिए ब्रह्मा विष्णु दोनों अलग-अलग दिशा में चले गए ,
एक आकाश की ओर तथा एक पाताल की ओर चले गए,
सहस्त्र 1000 वर्ष तक उस दिव्य ज्योति के आदि और अनन्त को ढूंढते रहे,
परंतु निराश होकर वापस अपने स्थान पर लौट आए,,
तब आकाशवाणी हुई कि ब्रह्मा और विष्णु तुम दोनों योग साधना करो तब योग के प्रभाव से प्रणव अर्थात “ओमकार” प्रकट हुआ,,
फिर प्रणव “ओंकार” के चार भाग हुए उसके भीतर से सगुण साकार रूप में भगवान भोलेनाथ प्रकट हुए,
इस प्रणव “ओम” का पहला अक्षर “अ” ही लिंग की ज्योति है दूसरा अक्षर “उ ” ज्योति का मध्य है,,,
आधी मात्रा नाद स्वरूप है,
वह उस ज्योति का मस्तक है ,और जो बिंदु है वह संपूर्ण लिंग का ज्योति स्वरूप है ,,
वेद भगवान सदाशिव को प्रणव रूप कहते हैं ,
तब भगवान शिव ने ब्रह्मा जी व विष्णु जी से कहा कि आप दोनों संपूर्ण चिंता तथा शोक को त्याग कर सुख पूर्वक अपना कार्य करो तथा हमने आप लोगों को जो अपना लिंग स्वरूप को दिखाया था उसका पूजन करो,,
लिंग पूजन हीं सर्वथा योग्य है, उसी के पूजन से सुख की प्राप्ति होगी,,
इस लिंग की उत्पत्ति का कारण यह है कि संपूर्ण संसार जिस क्षेत्र में लीन हुआ है ,उसी को लिंग कहते हैं ,,
अतः इस लिन्ग के पूजन करने से इस लोक और परलोक दोनों में सुख प्राप्त होता है ,
लिंग के पूजन की महिमा अनंत है,
तब ब्रह्मा जी ,विष्णु भगवान और सभी देवताओं ने भगवान शिव का पूजन किया ,
स्तुति और प्रार्थना भी की ,,
तब भगवान सदा शिव ने प्रसन्न होकर कहा आज का दिन परम पवित्र और और महान से महान होगा आज की तिथि “शिवरात्रि ” के नाम से विख्यात होगी और मेरे लिए अर्थात भगवान शिव के लिए परम प्रिय होगी जो मेरे लिंग व साकार रूप का आज के दिन अपनी शक्ति अनुसार निश्चल भाव से पूजन करेंगे,,
उनको संपूर्ण वर्ष में पूजन का फल प्राप्त होगा ,
जिस स्थान पर यह लिंग प्रकट हुआ था वह “अरुणाचल” नाम से प्रसिद्ध एवं वह भुमी “लिन्ग स्थान” के स्थान के नाम से जानी जाती है..
जय महादेव
Leave a Reply