“”गौतम ऋषि की पत्नि अहिल्या ब्रह्मा जी की रचना थी,
जैसे ब्रह्मा जी के मानसिक सन्कल्पना से उनके मानस पुत्र हुये,
उसी प्रकार ब्रह्मा जी ने अहिल्या ओर एक तिलोत्तमा नामक अप्सरा की रचना की थी,,
तत्कालिन समय मे अहिल्या से बढ़ कर समस्त सन्सार मे कोइ सुन्दर स्त्री नही थी,,
ब्रह्माण्ड मे जितनी भी सुन्दरिया थी अहिल्या जी सबसे सुन्दर थी..,,अहिल्या जी की रचना जब से ब्रह्मा जी ने की तबसे सभी देवता इन्द्र आदि सभी इन्हे प्राप्त करना चाहते थे,,
परन्तु ब्रह्मा जी ने किसी के साथ भी इनका विवाह नही किया,, गौतम ऋषि ने कभी भी अहिल्या जी को प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत नही की,,
अपितु पांच वर्ष तक निश्काम रहकर अहिल्या जी को न्रित्य सिखाते रहे,, तब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री अहिल्या जी का विवाह गौतम ऋषि के साथ हि कर दिया,, जब से अहिल्या जी सन्सार मे आयी इन्द्र तब से ही अहिल्या जी को चाहने लगे थे,,
एक दिन इसी लालसा से चन्द्रदेव की सहायता से आधिरात को गौतम ऋषि का रूप बनाकर , चन्द्रमा को मुर्गा बनवा के कुक्डुकू की आवाज निकलवा दी ,, जिससे गौतम ऋषि प्रातः काल समझ कर स्नान के लिये चले गये,, तब इन्द्र ने गौतम रूप मे अहिल्या जी से समागम किया,,
जब गौतम ऋषि स्नान करके वापस आये तब इन्द्र को अपने स्वरूप मे देख कर क्रोध मे इन्द्र को नपुंसक होने का श्राप दिया ओर अहिल्या जी को पत्थर शिला होने का श्राप दिया,,
यह गौतम ऋषि का व्याघ्रसर – बक्सर मे स्थित है,, यही पर शिला रूप से अहिल्या स्थित रही,, आगे चलकर भगवान श्री राम द्वारा मिथिला जाते समय अहिल्या का उद्धार हुआ था,,
गौतम ऋषि अहिल्या को श्राप देकर उस आश्रम से चले गये थे, ओर कही दुर जाकर गौतमालय नामक आश्रम बनवा कर रहने लगे यह स्थान अमेरिका देश मे स्थित है,,
वहा उन्होने कुछ नवीनतमवृक्ष लगाये,,
उन वृक्ष की विशेषता यह थी कि, उनके तने मे छेद करने से उसमे से अमृत के समान दुध निकलता था, जो कि अत्यंत पोश्टिक होता था, इस दुध मे फ़ेट्स भी अधिक हुआ करते थे ,,
दुध जमाकर दहि व दहि से घी भी बन जाता था, तथा इससे अनेको मीठाइया जैसे – रबडी, कलाकंद, खीर, भी बना सकते थे,,
आगे चलकर यहि गौतमालय ग्वाटीमाला के रूप मे प्रसीध्ह हो गया,, आज भी अमेरिका मे यह ग्वाटीमाला स्थित है,,
ओर वहा वे दुध वाले वृक्ष आज तक है,, इनकी एक विशेषता है कि ग्वाटीमाला से अलग अमेरिका या इंग्लैंड, भारत आदि अन्य स्थानो पर ये वृक्ष नही उगाये जा सकते,…
ज्योतिर्विद पं. -सुरेशचन्द्र
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