भगवान विष्णु जी के आँसूओ से सरयू नदी की उत्पत्ति हुइ
विष्णु पुराण की कथा के अनुसार पुर्व समय मे शन्खासुर नाम का राक्षस हुआ करता था,, उसका एक नाम हयग्रिव भी था,,
एक बार उसने ब्रह्मा जी द्वारा प्रकट किये गये चारो वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ओर अथर्ववेद का हरण करके पाताल मे चला गया,
उस समय भगवान विष्णु ने मतस्य अवतार धारण किया हुआ था,,
उन्होने उस सन्खासुर का वध किया ओर चारो वेद ब्रह्मा जी को प्रदान किये,,
उस समय भगवान अपने चतुर्भुज रूप से प्रकट हो गये, ओर हर्षातिरेक से भगवान की आँखो से हर्ष के आन्सु छलक पडे,
तब उन आंसूओ ने एक पवित्र जल वाली नदी का रूप ले लिया,
वह नदी आगे चलकर मानसरोवर मे मिल गयी,
आगे चलकर एक महाराज वैवस्वत मनु ने अयोध्या मे यग्य करने की इच्छा कि,
तब उन्होने अपने गुरु वशिश्ट ऋषि से निवेदन किया, तब उन्होने कहा कि न तो यहा कोइ पवित्र तिर्थ हे ओर न हि कोइ पवित्र नदी हे अतह यहा यग्य कैसे करे,,
तब महाराज वैवस्वत ने मनु ने अपने विशाल धनुष को चढाकर टन्कोर किया ओर बाण शर का अनुसंधान किया, वह बाण मानसरोवर का भेदन करके उसमे से भगवान विष्णु के आन्सुओ से जो नदी बनी थी, उस नदि को निकालकर उसका मार्गदर्शन करते हुए उसे अयोध्या ले आया ,
इस प्रकार बाण शर का अनुगमन करते हुये वह नदी अयोध्या आयी,,
इसी कारण इस नदी का नाम “”सरयू “” विख्यात हुआ..
फ़िर आगे चलकर यह सरयू नदि पुर्वी महासागर मे मिल गयी…
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